الأكثر مشاهدة

أخر المقالات

أشجار التوت العارية

مسرحـية

أشجار التوت العارية

تأليف

أحمد عادل القُضَّابي

المشهد الأول
المنظر يشبه مصنع بدائي للغزل؛ في أقصى يسار المسرح كتلة ضخمة من الصوف أعلاها خطافان يجذبان وبرًا من هذا الصوف لأعلى. وثمة خيطين مجدولين يدويًا ويصلان إلي المغزل العملاق الذي يتدلى من السقف في منتصف المسرح تمامًا، ويخرج منه خيطان يمران بأعلى إلي جهة اليمين قبل أن يتدليا ليلتفا علي بكرتين كبيرتين في منتصف يمين المسرح؛ يمكن أن يستخدما كمقعدين للجلوس.
المسرح مظلمٌ إلا من إضاءة الأشعة تحت الحمراء التي تنعكس علي الصوف والخيوط فقط، لتظهر لنا جثة رجل يستلقي بظهره علي كتلة الصوف دون أي حركة، كأنه تمثال.
ترتفع الموسيقى الوترية في تصاعد متدرج، وما أن تصل إلي ذروة هذا التصاعد حتى تصمت تمامًا، ليُقذف إلي المسرح بامرأةٍ مذعورةٍ مع إضاءة المسرح كاملاً، دون أن يتحرك الرجل أو يطرف له جفن. المرأة تحاول أن تُهدأ من روع نفسها، وتبحث عن مخرجٍ لها من هذا المكان دونما فائدة.. تهدأ المرأةُ عن الحركة في عمق يمين المسرح، لكن حيرتها مازالت تسيطر عليها. تنخفض الإضاءة إلي درجةٍ متوسطةٍ مع انسياب خطين موسيقيين لآلتي الفيولين والجيتار لكل منهما خصوصيته، لكنهما يتقاربان بلحنيهما إلى الهارموني، ويبعدان عن النشاذ.
الرجل من مكانه ودون أي حركة.. فالسمة العامة للرجل في هذا المشهد أنه قليل الحركة علي عكس المرأة التي يظهر توترها في حركتها الكثيفة.
هو : مساءُ الخير.
هي : لعلكَ تقصدُ صباحَ الخير!
هو : ربما كان الصباح!!
هي : ألا تستطيعَ أن تميزَ بين الصباحِ والمساء؟
هو : لا.. كيف يكون ذلك؟
هي : في الصباحِ يكون العملُ وأصواتُ العصافير. أما المساء؛ فيكون للنومِ وأضواءِ الشموع.
هو : لكني لا أسمعَ أصواتَ العصافير، ولا أري أحدًا يعمل.
هي : لعلكَ ترى أنه ليس الصباح.. حسنًا.. فلنطفئ الأنوار، ولنوقد الشموعَ ونذهبُ إلي الفراش.
هو : لن يكون ذلك قبلَ وصولِ السيد.
هي : أو أنت في انتظاره أيضًا؟
هو : نعم.
هي : أو تعرفه منذ زمن؟
هو : منذ أن كان يعزفُ علي الكمان في فرقتنا.
هي : أو كنت عازفًا ذاتَ يوم؟
هو : كنتُ أعزفُ علي جيتارٍ كهربائي.
هي : شيءٌ رائعٌ أن يستطيع الإنسانُ العزفَ علي آلةٍ موسيقية.
هو : الأروع من ذلك أن يعزفَ إنسانُ علي إنسانٍ أخر.. يحركُ أوتاره، ويجعله يصدر ما يشاء من الأصواتِ الرفيعةِ أو الغليظةِ، الأصواتِ العاليةِ أو المنخفضةِ.
هي : أتستطيع ذلك؟!
هو : كنتُ أستطيعُ ذلك فيما مضي، كنتُ كملكٍ علي عرشٍ من الجرانيت تحيطني العيون كما تحيطُ بالساحر. كنتُ أستطيع؛ ولمدةِ النصفِ ساعة؛ أن أفعلَ ذلك برشاقة. كنتُ أشدُ وترَ الحياةِ الشعري داخلُ أي إنسان؛ ذلك الوترُ الدقيقُ الذي تتركه الأم، وأبدأُ في ذبذبته بأصابعي، فتسيلُ منه الأصوات، وأجعلُه يتحرك بحثًا عن الحرية.
هي : والآن؟
هو : الآن.. لا.. أصبحتُ شديدُ التشابك، وأُعاني من الانزلاق.
هي : أي انزلاق؟!
هو : الانزلاقُ علي الصخورِ الضخمة.
هي : أنا لا أفهمك.
هو : لقد تحطمتُ.. ولا أستطيعَ أن أقومَ بأي جهدٍ قبلَ هبوطِ الليل.
هي : والنهار؟
هو : في النهارِ.. أحملُ جسدي إلي أي فراشٍ بسيطٍ يكفي للراحة.
هي : أليس هناك من يُنقذكَ من هذا؟
هو : هذه ـ أيضًا ـ فكرةٌ خاطئة.
هي : وما خطأها؟
هو : إنها أشبهُ ما يكون بإنسانٍ داخل غرفةٍ موصدةٍ بإحكامٍ وتحترق، وينتظرُ أن يأتي أحدُهم ليُنقذَه.. قبلَ أن يحترقَ هو ذاته.
هي : وماذا عليه أن يفعلَ في رأيك؟
هو : يعطفُ علي نفسه، ويحاولُ إنقاذها.
هي : جميل.. ولماذا لا تُنقذُ نفسك؟
هو : لقد تحطمتُ، وأريدُ من يجمعُ أجزائي المبعثرة.. أريدُ من يوقظُ روحي، ويملأني بالصراخ.
هي : لماذا لا تعطفَ علي نفسِكَ وتُنقذها؟
هو : لأنني ببساطةٍ لم أعدْ نفسي، لقد تبعثرتْ أجزائي بعد أن تحطمت.
هي : هل معكَ خارطةٌ لنفسك؟
هو : لا.. وهذا هو سرُ الفشل.
هي : ولعلكَ جئتَ إلي السيدِ لهذا السبب؟
هو : كيف عرفتِ ذلك؟
هي : الأمرُ بسيط.
هو : هل تركها معك؟
هي : لا.
هو : إذن كيف عرفتَ ذلك؟
هي : لأني هنا لذاتِ الغرض.
هو : الحصولُ علي خارطتِك؟!
هي : نعم.
هو : لكن.... هل سبقَ لكِ أن تحطمتِ علي ذاتِ الصخورِ الضخمة؟
هي : لا.. أنا لا أعرفَ هذه الصخورُ التي تتحدثُ عنها.
هو : إنها صخورٌ لا مرئية.. لكن لا أحدَ يجرؤ علي الاعترافِ بها.
هي : لماذا؟
هو : لأنهم لا يرونها. بالإضافةِ إلي ذلك، فهم يتخيلونها ورودًا أو زهورَ زئبق.
صمت
هي : أنتَ شاحب، لماذا لا تجلس؟
هو : أنتِ لم تجيبي علي سؤالي.
هي : أي سؤال؟
هو : كيف تحطمت؟
هي : أنا لم أتحطم.
هو : إذن؛ لماذا جئت؟ للحصولِ علي خارطتِكِ فقط؟
هي : لأعرفَ نفسي.
هو : تعرفين نفسك!!
هي : وما العجبُ في ذلك؟ أو تعرفُ نفسك؟
هو : كنتُ أعرفُها ذاتَ يوم.
هي : والآن؟
هو : الآن.. لا.
هي : هذا غريب!!
هو : لماذا؟
هي : لأن من استطاع أن يعرفَ نفسَه ذاتَ مرة، لا يمكن أن يفقدَ هذه المعرفةَ مهما حدث.
هو : مهما حدث!!
هي : ليتني استطعتُ ذلك مرةً واحدة!!
هو : ألم تعريفيها أبدًا؟!
هي : أبدًا.
هو : أنتِ مسكينة.
هي : وأنت أيضًا مسكين.
هو : إذن؛ فنحن الاثنان بائسان.
هي : تمامًا.
هو : وننتظرُ السيد؟
هي : لنحصلَ علي الخرائط.
هو : وإذا لم يأت؟؟
هي : سنظلُ ننتظر.
هو : للأبد؟
هي : ربما يكون للأبد.
هو : لكن هذا بشع!!
هي : حقًا.
هو : لا بد من وجودِ طريقٍ أخر.. حلٍ أخر.
هي : هل تعرفه؟
هو : دعينا نفكرُ في ذلك يا..........؛ ما اسمك؟
هي : أي اسمٍ تريد.
هو : أريدُ اسمك.. أليس لكِ اسم؟
هي : أسمني كيفما شئت، أو أسمني.. هي..
هو : هي؟
هي : نعم.
هو : نعم!! ماذا؟
هي : ألم تنادي عليَّ؟
هو : لا.. لقد قلتُ هي، مستفهمًا.
هي : ظننتُ أنكَ تنادي عليَّ.
هو : أريدُ اسمًا أعرفكِ به.
هي : أسمني هي قلتُ لك.
هو : هذا صعب.
هي : ليس صعبًا؛ شيئًا فشيء، ستعتادُ عليه. فعندما لا يعرفَ المرءُ نفسه، فإن أي شيءٍ يصلحُ لأن يكون اسمًا له.
هو : وماذا سيكون اسمي؟
هي : أي اسم. لأسمينكَ هو.
هو : هو؟
هي : هل أعجبكَ الاسم؟
هو : هو؟
هي : اسمٌ بسيطُ وسهل، ودالُ علي معناه.
هو : كيف؟
هي : أنتَ هو، لأنكَ رجل، وغائبٌ لأنكَ لا تعرفَ نفسَك، فوجودكَ المتعينُ غيرُ حقيقي. وأنا هي، لأني امرأة، وغائبةٌ لأني لا أعرفَ نفسي، ووجودي المتعينُ غيرُ حقيقي.
هو : هي وهو.. هو وهي!! كفي.. كفي..
هي : امرأةٌ ورجل. هي وهو.. غيرُ حقيقيين.. لا شيء.
هو : حسنًا يا هي.. دعينا نفكرُ في الأمر.
هي : أي أمر؟
هو : احتمالُ أن لا يأتي السيد.. أنسيت.
هي : هذا احتمالٌ قاسي.
هو : لكنه احتمالٌ قائم.
هي : حقًا.
هو : ماذا سنفعل؟
هي : هل تملكُ أن تفعلَ شيئًا أخر؟ لو كنتَ تملكُ ذلك، لفعلته، أليس كذلك؟
هو : حقًا.
هي : إذن عليكَ بالانتظار.
هو : الانتظار؟!
هي : أو تملكُ غيره؟
هو : لا.
هي : ودعنا نتسلى قليلاً في انتظارنا.
هو : كيف؟
هي : سنلعبُ لعبةً أحبها.
هو : ما هي؟
هي : لعبةُ الخيوطِ المتشابكة.
هو : لكني أعاني من التشابك، كما قلتُ لك.
هي : ربما ساعدتكَ هذه اللعبةَ علي حلِ هذا التشابكُ القائمُ داخلك.
هو : أعالجُ التشابكَ بالتشابك؟!
هي : أليس يُقال: "داوها بالتي كانت هي الداء"؟
هو : لكني لا أعرفَ لعبتك.
هي : سأشرحها لك.. إنها بسيطة، وتلعبُ بمثل هذا الخيط. [تستخرج خيطاً وتستخدمه في شرح اللعبة ] أنظر.. سنفرجُ الأصابع، ونضعُ الخيطَ هكذا. عليكَ أن تلتقطَ الخيطَ بأصابعكَ دون أن تلمسَ أصابعي، وعليكَ أيضًا أن تصنعَ تشابكًا أو تقاطعًا بين خطوطِ الخيطِ ذاته، وعليكَ ثالثًا أن تلقي أي سؤالٍ عليَّ. قبل أن ألتقطَ الخيطَ بأصابعي، وعلي أنا بدوري أن أجيبَ علي سؤالكَ، ثم ألتقطُ الخيطَ بأصابعي دون أن ألمسَ أصابعَك، وكذلك ألقي عليكَ سؤالاً.. أي سؤال.
هو : وما جدوى هذه اللعبة؟
هي : لا جدوى.. فقط تذهبُ بالوقت.. فعلينا أن نمضي بعضَ الوقتِ في انتظارِ السيد، ولن نمضيه مطبقي الشفاه.
هو : الأحرى بنا أن نفكرَ في طريقٍ أخرٍ بدلاً من الانتظار، وتمضية الوقتِ باللعب.
هي : يمكننا أن نفكرَ من خلالِ اللعبِ بطرحِ الأسئلة.
هو : حسنًا.. دعينا نجرب، علي الرغمِ من أني لم أفهمْ لعبتَكِ بعد.
هي : سأبدأ أنا أولاً. يا هو..
هو : نعم!!
هي : يجبُ أن تنظرَ إلي عيني عندَ طرحي للسؤال، وعندَ إجابتِكَ عليه.
هو : لماذا؟
هي : من أجلِ الصدق.
هو : الصدق؟
هي : نعم الصدق؛ فالصدقُ وعدمُ لمسِ الأصابع، وإنشاءُ تشابكٍ جديد؛ هي شروطِ هذه اللعبة.
هو : إنها لعبةٌ معقدة.
هي : لكنها مثيرة. سأبدأ.. هيا.. أنظرْ إليَّ.. هل أنتَ متزوج؟
هو : لا.
هي : عليكَ أن ترفعَ الخيط.. هيا.. هذا جيد. والآن دورك.
هو : دوري في ماذا؟
هي : في طرحِ الأسئلة.
هو : حسنًا.. لماذا سألتني هذا السؤال؟
هي : مجردُ فضول.
هو : هذه ليستْ إجابةٌ صادقة.
هي : (صمت).. معكَ حق.. لقد خسرت... (صمت).. لنبدأَ من جديد.
هو : هكذا.. دون أن أنالَ إجابة؟
هي : لقد خسرتُ كما قلتُ لك.
هو : لن أستمرَ في اللعب، هذا غش. لقد وضعتِ الشروط ووافقتكِ عليها، وعليكِ أن تلتزمي بها.
هي : وأنا ألتزمتُ، وخسرت.
هو : وما الفائدةُ التي نلتها من خسارتك؟
هي : المكسب.. الربح.. لقد ربحت.
هو : ربحتُ ماذا؟
هي : لا شيء.
هو : لا شيء؟
صوت : السيدُ يعتذرُ عن الحضورِ الليلة.

إظـــــــــــــــــــلام

المشهد الثاني
نفس المنظر السابق في المشهد الأول دون أي تغيير.. الرجل يجلس في عمق يسار المسرح ووجهه للخارج، والمرأة علي إحدي البكرتين الكبيرتين ووجهها للخارج أيضًا.
في البداية تكون الإضاءة خافتة مع لحن موسيقيّ طويل تتبادل فيه آلتي الفيولين والجيتار الأدوار في استكمال اللحن، إنه ليس كونشرتو.
هي : ألا ترغبَ في اللعبِ معي مرة أخري؟
هو : لا.
[صمت]
هي : ماذا أصابك؟
هو : لا شيء.
هي : إذن.. لماذا تنـزوي هكذا؟
هو : وماذا عليَّ أن أفعلَ غيرَ هذا؟
هي : تحدثْ معي.
هو : عن ماذا؟
هي : عنك.
هو : عني!!
هي : ولما لا؟ أم تريدُ أن أحدثكَ عني؟
هو : تحدثي إن أردت.
[صــمـت]
هي : لقد ولدتُ في قريةٍ نائية، مرميةٍ علي الضفةِ الشرقيةِ من النهر، كنتُ وأنا صغيرةٌ أذهبُ بصحبةِ ثلاثِ بناتٍ لملأ جرارَ الماءِ من النهر. كان النهرُ يبدو في نظرنا كأنه رجل. نعم.. جسدَ رجلٍ نائمٍ، ويحلمُ بأحلامٍ طيبة، كتلك التي كانت تقُصها أمي علينا في الصباح. كنا نلعب، ولا نجرؤ علي الاستحمامِ به.... لقد كنا نخجل.
هو : تخجلن؟
هي : نعم.. نخجلُ من ذلك الرجلِ الحالم، نخشى أن يستيقظَ فجأةً، وقد يمسكُ بإحدانا. لم تكن واحدةٌ منا تجرؤ علي الذهابِ إليه بمفردها. كنا نجلسُ أحيانًا إلي جواره، ونتحدثُ إليه، أو نستمعُ إلي صوته الرقيق، كان يزومُ أحيانًا، ويصدرُ بعضَ الأصواتِ العاليةِ النبرة، كأنه يحتج، ولم نكن نعرفُ السر، سرَ ذلك الاحتجاج، لكنه لا يلبثَ أن يهدأ، ويستمرُ في الحديثِ بصوته الناعمِ الرقيقِ إلينا.
هو : عما كان يتحدث؟
هي : فقط ضوضاء.. ضوضاء مسلية.. عن لا شيء.
هو : هذا ممل.
هي : إنه ليس ممل، لقد كان قادرًا علي أن يفعلَ أي شيء.... تصور!! لقد ابتلعَ رجلاً ذاتَ مرة . ظلَ الرجلُ يشرأبُ بعنقه ويمدُّ يده إلينا لننقذَه، دون أن تجرؤ إحدانا علي ذلك، حتى أرتعش... وسكنَ تمامًا....... وغاص.
هو : غرق!!
هي : لا.. بل ابتلعه حتى عنقه، نظرن نحوه برعب، لقد شاهدتُ عيونَ البناتِ غريبةً في ذلك اليوم، قبل أن يتهيأنَ للصراخ، وكان لابد من ذلك قبلَ الانطلاقِ للقرية.
هو : وأنت؟
هي : أنا؟ لا.. ظللتُ أحاولُ أن أري ذلك الرجل، لعله يخرج.. دون جدوى. كنتُ أودُ القفزَ إليه، لكن دقاتُ قلبي الصاخبةُ منعتني والدموع. لقد أصبتُ يومها بالحمى والخرس.
هو : وبعد ذلك؟
هي : لم أجرؤ علي الذهابِ إليه مرةً أخري.. حتى ولو ضربوني.
هو : هذا هو حالُ المرآةِ دائمًا.
هي : ماذا تقصد؟
هو : جبانة.. مُرتعدة.
هي : وهل تظن نفسكَ شجاع؟
هو : ربما.. ما المانع؟
هي : هل تجرؤ أن تشعلَ النارَ في جسدك؟
هو : هذه ليستْ شجاعة.
هي : لكن كثيرٌ من الفتياتِ يستطعنَ ذلك للتخلصِ من الحياة.
هو : هذا لأن أجسادَهن رخيصة.
هي : أتقصدُ أنهن ساقطات؟
هو : أنا لا أقصدَ ذلك. جسدُ المرأةِ عمومًا شيءٌ رخيصٌ لديها، والساقطاتُ يمثلن دليلاً علي رخصِ الأجساد. ألا يبعنه لدافعِ الثمن؟
هي : والرجلُ هو صاحبُ الجسدِ الغالي العزيز؟
هو : أريتِ رجلاً ـ مثلاً ـ يشعلَ النارَ في جسدِه لينتحر، نادرًا. إنه يتخلصُ من الحياةِ بأسرعِ وسيلة، مثلُ إطلاقِ الرصاصِ علي الجمجمةِ مباشرة.
هي : هذا يعودُ إلي أن الرجالَ عادةً ما يحملون أسلحة.
هو : وهل النساءُ محرمٌ عليهن حملُ السلاح؟
هي : لا.. ولكن هذا يتنافى مع طبيعةِ المرآةِ المائلةِ إلي الرقةِ والنعومةِ، و.....
هو : والجبن.
هي : لماذا تصرُّ علي أننا جبناء؟
هو : لأن هذه هي الحقيقة.
هي : من وجهةِ نظرِكَ فقط.
هو : إذن لماذا يحتمين بالرجال؟
هي : م.. م.. مم.. لأنهم أقوياء.
هو : ها.. ها.. ها.. ها..
هي : ما الذي يضحكُك؟
هو : لا شيء.. ها.. ها.. لا شيء.
هي : لماذا لا تحدثني عن نفسِكَ بدلاً من الضحك؟
هو : عن أي شيء تريديني أن أحدثك؟
هي : مثلاً.... لماذا لم تتزوج حتى الآن؟
هو : يبدو أن هذا الموضوعَ يشغلُكِ جدًا.
هي : إنه لا يشغلُني، بل يُثير فضولي.
هو : ما زلتِ تُصرين علي الكذب!!
هي : حسنًا.. إنه يشغلُني.. حدثني عنه إذن.
هو : ليكن.. لا شيء.. سوى الفقر.. أو كما يقولون.. ليس لدي ما يُسمونه الإمكانيات التي تؤهلني للزواج.
هي : هل تقصدُ الإمكانيات المالية؟
هو : بالطبع؛ ولا شيءَ غيرها.. لا.. هناك نقطةٌ أخرىٌ هامةٌ منعتني عن الزواج.
هي : ما هي؟
هو : أنني لم أقابل تلك المرأةَ التي تُثيرني وتدفعني للعملِ من أجلِ الزواجِ بها. طوالَ الوقتِ لم يكنْ لدي الحافز، فما أحصلُ عليه من مالٍ أنفقه علي مسراتي وحياتي، فالزواجُ بالنسبةِ لي لم يكن هدفًا أسعى لنيله.
هي : وإذا قابلتَ هذه المرأةَ في آخرِ العمر، ماذا ستقول لها؟
هو : سأقول لها.. أن الوقتَ قد فات.
هي : هكذا، وبكلِ بساطة؟!
هو : وماذا عساي اصنع؟ لقد انتظرتها كثيرًا كي تأتي، لكنها مثل هذا السيدِ الذي ننتظره ولا يأتي، ويكتفي بالاعتذارِ عن الحضور. أتكفي هذه الإجابة؟
هي : تكفي.
هو : ماذا بك؟
هي : لقد ذكرتني بالسيدِ الذي ننتظره ولا يأتي.
هو : وماذا عسانا نصنعُ سوى الانتظار؟!
هي : كنتَ تعتقدُ أن بإمكاننا البحثُ عن حل.. طريق.. يُخرجُنا من هذا الانتظارِ الثقيلِ الذي يكادُ أن يقتلَ أرواحنا.
هو : نعم.
هي : لماذا لا تعاودَ التفكيرَ في ذلك؟
هو : وأنت؟
هي : سأحاولُ أن أساعدك.
هو : حتى ولو كان الطريقُ شاقًا ومضنيًا؟
هي : حتى ولو كان الطريق........... هه!! هل وجدته إذن؟
هو : لا.. لكني فقط أختبرُ صلابتك.
هي : ماذا تظن نفسك؟
هو : لا شيء.
هي : حسنًا.. أيها اللاشيء.. حاول أن تفعلَ شيئًا.
هو : أفعلُ شيئًا!! مثل ماذا؟
هي : مثلُ التفكيرِ في الطريقِ البديل.
هو : آه.. قولي لي مرةً أخرى؛ لماذا تريدين السيد؟
هي : كي أعرفَ نفسي.
هو : وأنا كذلك.. لماذا لا يلعبَ أحدُنا دورَ السيدِ مع الأخرِ ليجدَ له نفسه؟
هي : رائع.. هيا إذن!!
هو : هيا إذن؟ هكذا!! وبكل بساطة!! علي حدِ تعبيرك. إذن هيا.. عليكِ أن تلعبي أنتِ أولاً دورَ السيد.
هي : أنتَ الرجلُ يا هو.
هو : أنا الرجل!! وهل هذا سببًا كافيًا لأن ألعبَ أنا هذا الدور؟
هي : نعم.
هو : لماذا؟
هي : لأن السيدَ رجلٌ مثلك، وطبيعتُكَ الذكوريةُ تؤهلكَ أكثرَ مني للعبِ هذا الدور.
هو : وأنت؟
هي : أنا امرأة، لا أستطيع أن ألعبَ دورَ السيد.
هو : ألم تقولي لي؛ أنكِ ستساعدينني إذا وجدتُ الطريق؟
هي : نعم.. لكني لا أستطيعَ أن ألعبَ دورَ السيد، ربما تستطيعُ أنت، لأنكَ رجل.
هو : أنتِ ماكرة.. تركتني أبحثُ عن الطريق، وعندما وجدته، وراق لكِ، تخليتِ عن مساعدتي، وأردتِ جني الأرباحَ بمفردك.
هي : لم أقصدْ هذا.. دعنا نحاول فقط.
هو : وإذا حاولنا، ولعبتُ دورَ السيد، وحصلتِ أنتِ علي نفسك، ربما تتركينني، وتذهبين.
هي : لا.. لن أفعلَ ذلك، سأبقى كي تعثرَ أنتَ الأخرُ علي نفسك.
هو : أنا لا أثقَ بك.
هي : وكيف أجعلكَ تثقُ بي؟
هو : لا أعرف.
هي : لابد من وجودِ طريقةٍ لذلك!
هو : ما هي؟
هي : أنا لا أعرف، فأنتَ الذي لا تثقَ بي.
هو : فكري معي إذن، ما الذي يجعلني أثقُ بك؟
[صــمـت]
هي : يا هو.....
هو : لا تناديني بهذا الاسم، إني اشمأز منه.
هي : حسنٌ. بماذا أناديك؟
هو : بأي اسم.
هي : أنا لا أعرفَ لكَ اسمًا سوى هو!!
هو : أسمني أنت.
هي : حسنًا..وإن كانت ثمةُ مغالطةٌ في الأمر.. يا أنت.
هو : ماذا تريدين؟
هي : ألستَ شهمًا؟
هو : أي شيءٍ تريدي أن تصطادي بهذا السؤال؟
هي : فقط؛ أريد أن أعرف، ما إذا كنتَ شهمًا أم لا؟
هو : أعتقدُ أنني شهم.
هي : إذن؛ فبكَ شهامة؟
هو : بما أنني شهم، فبي شهامة. ماذا تريدين منها؟
هي : هل من الشهامةِ أن تري امرأةً رقيقة، في حاجةٍ إلي مساعدةٍ ولا تساعدها؟.. إنني فقط أتساءل.
هو : إنك حقاً ماكرة.. بي شهامة، ولكنكِ لستِ المرأةَ الرقيقة.
هي : هذه إهانة.
هو : أنا لا أقصدَ إهانتك.
هي : لقد أهنتني بالفعل؛ دون أن تقصد. ماذا أكون إذن، إذا لم أكن المرأةُ الرقيقة.. التي تحتاجُ إلي مساعدةِ رجلٍ به شهامة.. في موقفٍ كهذا؟
هو : أنا لا أختلفَ معكِ في أنكِ امرأة، لكني قد أخالفُكِ الرأي في مسألةِ الرقةِ هذه. لماذا تدعين ما ليس فيك؟!
هي : ماذا أكون إذن؛ إذا لم أكن رقيقة؟
هو : امرأة.
هي : وما هي الصفةُ أو الحالةُ التي تميزُ هذه المرأةَ عن غيرها؟
هو : ليس ها هنا نساءً لأميزكِ عنهن.
هي : أنا لا أمزح.
هو : ولا أنا.
هي : يجبُ أن تكون هناك صفةً أو حالةً تميزني بها، ماذا يمكن أن تصفني به لأحدِ أصدقائك؟ هل ستقول له؛ لقد قابلتُ امرأة، دون أن تذكرَ صفةً لها، مثل الجمالِ، أو الرقةِ، أو غيرهما من الصفات.
هو : آه.. سأصفكِ له بالجبن.
هي : لكني لستُ جبانة.
هو : أنت ترتعدين جبنًا.
هي : قلتُ لك؛ إنني لستُ جبانة، ولا أرتعد.
هو : (يسقط علي الأرض ، ويمسك بحنجرته ) يا ...............
هي : (ترتعد) ماذا بك؟
هو : إني........ أختنق......... اصنعي شيئًا......... أكادُ أن.......... أفقدُ الهواء...... لا...... أستطيعُ أن..... أن أتنفس....... اصنعي شيئًا...........
هي : لا أعرفَ ماذا أصنع!
هو : أرجوك ......أفعلي أي.... شيء....... أني......... أختنق.......... أموت......... أفعلي شيئًا...........
هي : لا أستطيع.
هو : اصرخي............ اصرخي......... أرجوك...... اصرخي من أجلي.................... اصرخي..... وبكل قوة...... أني...... إنني...... أمووووووووووووووت.......
هي : آآآآآآآآآآآآآآآآآآآآآآآآه.............. (تصرخ صرخات متلاحقة، وتسقط وهي تبكي، بينما ينهض مبتسمًا سعيدًا).
هو : بماذا تشعرين؟
هي : ........... ماذا صنعتَ بي؟؟؟
هو : أوجدتِ نفسك؟؟
هي : يبدو لي ذلك.. بالفعل.............. لقد عثرتُ عليها. (تنهض، وتحتضنه في فرح وهي تصيح) عثرتُ عليها.. عثرتُ عليها.
هو : هنيئًا لك.
هي : وأنت؟
هو : سأواصلُ الانتظار.
هي : وأنا؟
هو : يمكنك الانصراف، ألم تحصلي علي بغيتك؟
هي : لكني لا أستطيعَ أن أتركك.
هو : لماذا؟
هي : يجبُ أن أساعدك.
هو : لا يمكنكِ ذلك.
هي : لقد عثرتُ علي نفسي، ويمكنني أن أصنعَ أي شيء.
هو : إلا هذه.
هي : لماذا؟
هو : لأن الشهامةَ تخصُ الرجالَ فقط.
هي : والنساء أيضًا.. سأنتظر.
هو : تنتظرين من؟
هي : أنتظرك.
هو : لكني موجود معكِ بالفعل.
هي : أقصد؛ سأنتظرُ حتى تعثرَ علي نفسك، وننصرف سويًا.
هو : قد يطولُ الأمر.
هي : لا يهم.
هو : قد لا يأتي السيد.
هي : ثمة طريقٍ أخرٍ غير الانتظار.
هو : قد لا أجده.
هي : سنجده سويًا.
هو : متي؟
هي : لا أعرف؛ لكني سأنتظرُ معكَ حتى تجده، ولن أنصرفَ بدونك.
هو : سيصيبُكِ الملل.
هي : سنلعبُ قليلاً.
هو : قد يصيبُكِ اليأس.
هي : إنني........ إنني..............
هو : إنك ماذا؟
هي : إنني سأنتظرُ معك.. هذه هي كلمتي الأخيرة.
صوت : السيدُ يعتذرُ عن الحضورِ الليلة.

إظــــــــــــــلام

التعليقات